छह दिन की रैली के बाद बाज़ार ने ब्रेक लगाया और वो भी तेज़। शेयर बाजार में बिकवाली ऐसी रही कि सेंसेक्स 700 अंक लुढ़ककर 81,474.22 पर आ गया, नीचे 0.64%। निफ्टी भी 0.68% गिरकर 24,913.30 पर बंद हुआ। महीने भर में सेंसेक्स की गिरावट 1.72% तक पहुंच चुकी है, हालांकि सालाना आधार पर अभी भी हल्की 0.27% बढ़त बनी हुई है। यह करेक्शन 2024 की जोरदार तेजी और 2025 की शुरुआत में आए झटकों के बाद निवेशकों की बढ़ती सतर्कता दिखाता है।
माहौल बिगाड़ने वाले कारण एक साथ सामने आए—टैरिफ को लेकर अनिश्चितता, हालिया उछाल के बाद प्रॉफिट-बुकिंग, और जैक्सन होल में फेड चेयर जेरोम पॉवेल की होने वाली टिप्पणी से पहले ग्लोबल रिस्क-ऑफ। इनके बीच विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने कमज़ोर धार को और कमजोर किया। घरेलू मोर्चे पर महंगाई और ऊंचे ब्याज दरों की लंबी अवधि की चिंता भी भावनाओं पर भारी पड़ी।
सेक्टरों की बात करें तो फार्मा और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख इंडेक्स लाल निशान में रहे। बैंकिंग और फाइनेंशियल्स पर सबसे ज्यादा दबाव दिखा, इंडेक्स 1% तक फिसला। एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक जैसी फ्रंटलाइन बैंकों में तेज़ बिकवाली दिखी। आईटी शेयर, जो पिछले तीन सत्रों में करीब 3% चढ़े थे, मुनाफावसूली में फंसकर 1% तक नीचे आ गए।
टॉप लूजर्स में हीरो मोटोकॉर्प, एचसीएल टेक, एचडीएफसी बैंक, ग्रासिम और एशियन पेंट्स शामिल रहे, जिनमें इंट्राडे में 2% तक की गिरावट दिखी। दूसरी ओर, बाजार की उथल-पुथल के बीच भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, बजाज फाइनेंस, महिंद्रा एंड महिंद्रा, सन फार्मा और ट्रेंट में खरीदारी उभरी और ये स्टॉक्स टॉप गेनर्स बने। यह बिखरी हुई चाल बताती है कि निवेशक अभी डिफेंसिव पॉकेट्स और कंपनी-विशेष ट्रिगर्स पर दांव लगा रहे हैं।
ग्लोबल संकेत भी मददगार नहीं रहे। अमेरिकी बाजारों में एसएंडपी 500 और डाउ 1.7% तक गिरे, नैस्डैक 2.1% फिसला—टेक स्टॉक्स दबाव में रहे। भारतीय आईटी पर इसका सीधा असर दिखा क्योंकि कंसल्टिंग डील्स और डिस्क्रिशनरी टेक खर्च पर मंदी का डर जग रहा है। वहीं घरेलू फाइनेंशियल्स में एसेट क्वालिटी और क्रेडिट ग्रोथ पर संभावित असर को लेकर सतर्कता बढ़ गई है।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2025 की शुरुआत में आई तेज गिरावट के बाद मार्च में फाइनेंशियल सर्विसेज इंडेक्स में करीब 9% की रिबाउंड दिखी थी, लेकिन बेस मैक्रो हेडविंड्स—जैसे ग्लोबल ग्रोथ स्लोडाउन, महंगाई और ऊंची दरें—ने उस बढ़त को टिकने नहीं दिया। यही वजह है कि हर उछाल पर प्रॉफिट-बुकिंग तेज हो रही है और ट्रेंड के बजाय ट्रेडिंग-ड्रिवन मूव्स हावी हैं।
विश्लेषकों का अनुमान है कि अगले कुछ हफ्तों में बाजार 5% तक और फिसल सकता है—कारण साफ हैं: लगातार FII आउटफ्लो, वैश्विक व्यापार तनाव, अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर सवाल, महंगाई का दबाव और ऊंची ब्याज दरें। इसका मतलब क्या? मौजूदा स्तरों से 5% गिरावट सेंसेक्स को लगभग 77,400–77,500 के दायरे और निफ्टी को करीब 23,650–23,700 तक धकेल सकती है। यह अनुमान हैं, पक्के स्तर नहीं, लेकिन जोखिम का आईना जरूर दिखाते हैं।
रुपये को संभालने के लिए रिज़र्व बैंक समय-समय पर हस्तक्षेप कर रहा है ताकि अत्यधिक उतार-चढ़ाव न बढ़े। सेबी ने भी वोलैटिलिटी पर लगाम के लिए नियम सख्त किए हैं—शॉर्ट-टर्म स्पाइक्स और सर्किट-सिचुएशंस से निपटने के लिए यह कवायद जारी है। सरकार भरोसा बहाल करने के लिए लक्षित प्रोत्साहन विकल्पों पर विचार कर रही है, हालांकि फोकस फाइनेंशियल स्टेबिलिटी और राजकोषीय अनुशासन के बीच संतुलन पर है।
GDP ग्रोथ पर असर कैसे पड़ सकता है? तीन चैनल अहम हैं। पहला, वेल्थ इफेक्ट—बाजार गिरता है तो निवेशकों की नेट वर्थ घटती है, हाई-टिकट डिस्क्रिशनरी खर्च धीमा पड़ता है। दूसरा, कॉरपोरेट कैपेक्स—अनिश्चितता बढ़ते ही कंपनियां निवेश योजनाएं टालती हैं, जिससे ऑर्डर बुक और रोजगार पर असर आता है। तीसरा, फाइनेंशियल कंडीशंस—ब्याज दरें ऊंची रहें तो उधारी महंगी होती है, खासकर एमएसएमई और रेट-सेंसिटिव सेक्टरों पर बोझ बढ़ता है। यही वजह है कि अर्थशास्त्री अब 2025 के लिए ग्रोथ आउटलुक पर थोड़े सतर्क दिख रहे हैं।
सेक्टर-स्तर पर दर्द असमान है। फाइनेंशियल सर्विसेज और आईटी सबसे ज्यादा दबाव में हैं—एक तरफ एनबीएफसी के फंडिंग कॉस्ट और मार्जिन पर चिंता, दूसरी तरफ ग्लोबल क्लाइंट्स का टेक बजट कसना। कंज्यूमर स्टेपल्स और फार्मा में तुलनात्मक मजबूती दिख रही है क्योंकि ये डिफेंसिव नेचर के हैं। ऑटो में मिश्रित तस्वीर है—प्रीमियम सेगमेंट में मांग ठीक-ठाक, लेकिन एंट्री-लेवल में कीमत और फाइनेंसिंग कॉस्ट बाधा बन रहे हैं। कैपिटल गुड्स और मैन्युफैक्चरिंग में ऑर्डर फ्लो अच्छा है, पर नया कैपेक्स साइकिल अनिश्चित माहौल में धीमा हो सकता है।
निवेशकों की नब्ज पर बड़े इवेंट्स और डेटा का सीधा असर होगा। अगले कुछ दिनों में ये कारक टोन सेट कर सकते हैं:
रुपये की चाल भी देखने लायक है। कमजोर डॉलर और स्थिर कमोडिटी कीमतें राहत देती हैं, पर वैश्विक रिस्क-ऑफ में उभरते बाजारों की करेंसी सबसे पहले दबाव में आती है। यही वजह है कि आरबीआई का फोकस वोलैटिलिटी स्मूद करने पर है, न कि किसी खास स्तर की रक्षा पर। स्थिर मुद्रा माहौल विदेशी निवेश के लिए भी भरोसा बढ़ाता है।
क्या अब भी रिबाउंड की गुंजाइश है? मार्केट स्ट्रक्चर बताता है कि हर तेज गिरावट के बाद शॉर्ट-कवरिंग बाउंस मिल सकता है, लेकिन टिकाऊ तेजी के लिए जरूरी है—महंगाई में ठोस राहत, फेड के टोन में सॉफ्टनेस और घरेलू कमाई में स्थिर अपग्रेड। तब तक रेंज-ट्रेड और सेक्टर रोटेशन का खेल चलता रहेगा।
कमजोरी के बीच रौशनी कहां? क्वालिटी बैलेंस शीट, मजबूत कैश फ्लो और बिजनेस विजिबिलिटी वाली कंपनियों में डिप-बायिंग की दिलचस्पी बनी रहती है—यही वजह है कि आज जैसे दिन में भी कुछ चुनिंदा स्टॉक्स हरे दिखे। लेकिन मैक्रो जोखिमों को देखते हुए भागीदारी मापी-तौली है।
संक्षेप में, बाजार इस वक्त ग्लोबल संकेतों और घरेलू आंकड़ों के बीच रस्साकशी में फंसा है। अगले कुछ हफ्तों में 5% तक की और गिरावट का जोखिम बना हुआ है और इसका असर निवेश, खपत और अंततः GDP ग्रोथ पर महसूस हो सकता है। पॉलिसी मोर्चे से स्थिर संकेत और महंगाई में ठहराव ही इस दबाव को कम कर सकते हैं। तब तक उतार-चढ़ाव को ही नया नॉर्म मानना होगा।